दहेज़ व घरेलु हिंसा कानूनों का दुरूपयोग समाज के लिए बने अभिशाप
दहेज़ व घरेलु हिंसा कानूनों का दुरूपयोग समाज के लिए बने अभिशाप
बदलता समय अपने साथ, तरक्की, अच्छाइयों और कुछ बुराइयां भी लेके चलता हैं, इसी कारणवश महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के नाम पर बने दहेज़ व घरेलु हिंसा के कानून भी इससे अछूते नहीं रह पाए, इसके दुरूपयोग से पुरुषों एवं उनके परिवारों पर खौफ की तलवार लटकी रहती हैं । कुछ महिलाएं इस कानून को अब ढाल की तरह नहीं लेकिन अपने पतियों और उनके परिवारों पर हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही हैं और बेचारे निर्दोष पति-परिवार बिना किसी जुर्म के सजा भुगतने के लिए मजबूर हैं ।
व्यवस्था दोष:
पिछले कुछ सालों में घरेलू हिंसा व दहेज़ कानून के दुरुपयोग के मामलों में बेतहाशा वृद्धि हुई है क्यूंकि जरा सी बात पर बहुएं अपने मायके वालों के समर्थन से निर्दोष पतियों पर, पति-परिवार के सदस्यों पर एवं दूर के रिश्तेदारों पर अपनी मनमर्जी करने के लिए महज दबाव बनाने की नियत से झूठे मुकदमें दर्ज करा देती है तथा बिना जाँच व सबूतों के उन्हें थाना-कचहरी के चक्कर लगाने पर मजबूर कर देती है ।
निर्दोष पति व उसका परिवार न्याय की आस में इधर-उधर भटकता रहता है और सालों कचहरी में न्याय की गुहार लगाता रहता है । इन कानूनों के दुरुपयोग से सिर्फ पति या उसका परिवार ही प्रताड़ित नहीं होता बल्कि सबसे ज्यादा असर उन मासूम बच्चों पर होता है जो की अपने माता-पिता के आरोप-प्रत्यरोप और क़ानूनी दांव-पेच के बीच पिस जातें है और अपने माँ-बाप तथा दादा-दादी/ नाना-नानी के प्यार-दुलार से वंचित रह जाते हैं ।
क्या वाकई यह नियम महिलाओं के अनुकूल हैं ?
जब कुछ बहुएं अपने निजी स्वार्थ के चलते अपने पतियों के साथ उनके परिवारों की महिलाओं पर जिसमें सास, ननद, जेठानी, और देवरानी आदि जैसों पर झूठे इल्जाम लगाकर मुकदमें दर्ज कराती है, तो एक महिला द्वारा ही दूसरी महिला के अधिकार का हनन किया जाता है, जो की इस कानून का महिलाओं के प्रति अनुकूलता पर प्रश्न-चिन्ह लगाता है? क्यूंकि महज एक महिला द्वारा लगाया झूठा इल्जाम एक संपन्न परिवार को तबाह कर देता है तथा इन परिवारों की न सिर्फ सामाजिक प्रतिष्ठा की बली चढ़ जाती है बल्कि इन्हे सामाजिक और मानसिक परेशानियों से रूबरू भी होना पड़ता है । यहाँ तक की कई पति तो अपनी पत्नी द्वारा झूठे मुकदमें दर्ज कराने के उपरान्त मजबूर होकर आत्महत्या तक कर लेते है जबकी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार उनकी संख्या महिलाओं द्वारा की गयी आत्महत्या करने की संख्या से दुगने से भी ज्यादा है । घर के सदस्य के द्वारा इस तरह दुनिया से चले जाने से उससे जुडी महिला सदस्यों माँ, बहन, बेटी, भाभी, चाची आदि महिलाओं को भी अपूरणीय क्षति होती है और अगर उस सदस्य से ही घर की आय का स्रोत होता है तो उस घर की स्थिति बद-से-बद्तर हो जाती है और पूरा परिवार संकट में आ जाता है ।
आओ परिवार बचायें (सेव इंडियन फॅमिली) पुरुष हेल्पलाइन 0888-2-498-498
सेव इंडियन फॅमिली और उससे जुड़े कई संगठन धारा 498A एवं घरेलु हिंसा अधिनियम आदि लिंग भेदी महिला कानूनों का दुरुपयोग रोकने और इसके शिकार लोगों की मदद करने के लिए आगे आ रहे हैं जिसमें से “पति-परिवार” कल्याण समिती, लखनऊ में बड़ी त्तपरता से काम कर रही है और उसके संस्थापक श्री यक्ष सिंह एवं उनके कर्मठ सदस्य स्वेच्छा से निशुल्क समाज को जागरुक करने हेतु तन, मन और धन से पीड़ित व्यक्तियों की मदद कर रहे है एवं इस कानून के दुरूपयोग पर मीडिया, आम जनता व प्रशासन एवं न्यायालय के समक्ष अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे है । विगत दस वर्षों से अधिक समय से लखनऊ में परिवर्तन चौक स्थित ‘लक्ष्मण पार्क’ में प्रत्येक रविवार को शाम के समय पीडतों को अपने अनुभव से मार्गदर्शन और सम्बल दिया जाता है, ताकि वे आत्महत्या जैसा कदम न उठाये क्योंकि कानून में उनकी कोई सुनता नहीं है, घर-परिवार और दोस्त-यार भी यही समझते हैं कि “कुछ तो किया ही होगा”. बिना उसके पक्ष सुने ही दोषियों जैसी कार्यवाही से व्यक्ति टूट जाता है, संस्था ऐसे लोगो को विश्वास दिलाती है कि आप अकेले नहीं हैं, एवं परेशान होने की जरूरत नहीं है तथा संयम से काम लें और सोच-समझ कर उचित कदम उठाने पर कुछ ही समय में यह बुरा वक़्त भी टल जायेगा ।